आलस की कीमत | Laziness Story for Kids in Hindi

आलस की वजह से उदास बैठा एक भारतीय स्कूली बच्चा, किताबें खुली हुई और माता-पिता चिंतित दिखाई देते हुए, वास्तविक जीवन पर आधारित प्रेरक कहानी का दृश्य।

Laziness Story for Kids in Hindi


 राहुल एक साधारण परिवार का बच्चा था। वह शहर के एक सरकारी स्कूल में पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था। राहुल में कोई कमी नहीं थी—वह समझदार था, तेज़ दिमाग का था और जब मन लगाता, तो अच्छे नंबर भी ले आता। लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या थी आलस

राहुल सुबह देर से उठता। स्कूल जाने की जल्दी में होमवर्क अधूरा रहता। माँ रोज़ समझातीं—

“बेटा, समय पर काम किया करो। बाद में करने की आदत अच्छी नहीं होती।”

लेकिन राहुल हँसकर कह देता—

“माँ, अभी तो बहुत टाइम है।”

स्कूल में टीचर जब नोटबुक चेक करतीं, तो राहुल अक्सर बहाना बना देता—

“मैम, आज पूरा नहीं हो पाया।”

पहले-पहले टीचर ने समझाया, लेकिन धीरे-धीरे उनका भरोसा भी कम होने लगा।

छठी कक्षा में आते-आते पढ़ाई थोड़ी मुश्किल हो गई। जो बच्चे रोज़ पढ़ते थे, वे आगे निकलने लगे। राहुल सब कुछ समझता था, लेकिन पढ़ने में आलस करता था। वह सोचता था कि परीक्षा से एक-दो दिन पहले पढ़ लूँगा।

फिर सालाना परीक्षा आई। राहुल ने आख़िरी समय में पढ़ने की कोशिश की, लेकिन बहुत कुछ समझ में नहीं आया। परीक्षा का रिज़ल्ट आया तो वह दो विषयों में फेल हो गया।

यह उसके लिए बहुत बड़ा झटका था।

जब वह घर पहुँचा, तो पिता ने रिपोर्ट कार्ड देखा और शांत स्वर में बोले—

“राहुल, हमें नंबरों से ज्यादा दुख इस बात का है कि तुमने अपनी काबिलियत को आलस की वजह से बर्बाद किया।”

उस दिन राहुल पहली बार रोया। उसे समझ आ गया कि यह हार किसी और की वजह से नहीं, बल्कि उसके अपने आलस की वजह से थी।

अगले दिन स्कूल में उसे दोस्तों के सामने रुकना पड़ा, क्योंकि वह अगली कक्षा में नहीं जा पाया। उसके दोस्त आगे बढ़ गए थे। यह बात राहुल के दिल में चुभ गई।

उसे महसूस हुआ कि आलस सिर्फ समय नहीं लेता, आत्मविश्वास भी छीन लेता है।

उसी दिन राहुल ने एक छोटा-सा फैसला लिया। उसने खुद से कहा—

“मैं पूरी दुनिया नहीं बदल सकता, लेकिन अपनी आदत जरूर बदल सकता हूँ।”

उसने रोज़ सिर्फ 30 मिनट पढ़ने से शुरुआत की।

मोबाइल कम कर दिया।

होमवर्क उसी दिन पूरा करने लगा।

धीरे-धीरे पढ़ाई का डर खत्म होने लगा।

एक साल बाद जब दोबारा परीक्षा हुई, राहुल पास ही नहीं हुआ, बल्कि अच्छे नंबर भी लाया। टीचर ने पूरी क्लास के सामने कहा—

“राहुल की मेहनत इस बात का सबूत है कि जो बच्चा आलस छोड़ देता है, वह ज़रूर आगे बढ़ता है।”

राहुल मुस्कराया। उसे अब समझ आ चुका था कि—

🌱 सीख (Moral of the Real Story)

आलस कोई बीमारी नहीं, एक आदत है — और आदत बदली जा सकती है।

बच्चा आज मेहनत से बचता है, वह कल मौके से चूक जाता है।

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